Essay On Global Warming In Hindi: ग्लोबल वार्मिंग इन हिंदी, वैश्विक तापमान

By | जून 1, 2021

Essay on global warming in Hindi: ग्लोबल वार्मिंग से तात्पर्य वैश्विक औसत तापमान में हुए वृद्धि से है। जिसका मुख्य कारण ग्रीन हाउस गैसें तथा प्रदूषण है।

Essay On Global Warming In Hindi: ग्लोबल वार्मिंग इन हिंदी

ग्लोबल वार्मिंग पर निबंध

वैश्विक तापमान के इसी वृद्धि को ‘ग्लोबल वार्मिंग’ की संज्ञा सर्वप्रथम ब्रिटिश पर्यावरणविद् ‘वालेस बोएकर’ ने 1970 के दशक में प्रदान किया था।

Causes of global warming in Hindi (Global warming ke karan in Hindi)

पिछले कुछ दशर्को में पृथ्वी और इसके वायुमण्डल का तापमान लगातार बढ़ रहा है। ग्लोबल वार्मिंग का मुख्य कारण पर्यावरण प्रदूषण के लिए उत्तरदायी ग्रीन हाउस गैसें (जैसे- CO2, क्लोरोफ्लोरो कार्बन, मीथेन,  नाइट्रस आक्साइड तथा ओजोन) तथा पर्यावरण प्रदूषण हैं। ग्लोबल वार्मिंग के लिए जिम्मेदार सर्वप्रमुख गैस ‘कार्बन डाइऑक्साइड’ है। 1900 के प्रारम्य में वायुमण्डल में CO2 की मात्रा 280 PPM, जो आज 379 PPM तक पहुंच गई है।’
ग्रीन हाउस गैसें पृथ्वी, पार्थिव विकिरण के रूप में उत्सर्जित ऊष्मा को अनन्त वायुमण्डल में जाने से रोके रखती हैं जिसके कारण वायुमण्डल के औसत तापमान में वृद्धि हो जाती है।

Effects of global warming in Hindi (ग्लोबल वार्मिंग इन हिंदी)

भूमण्डलीय तापन वास्तव में 18वीं सदी की औद्योगिक स्तर की कांति का परिणाम है। इसका श्री गणेश 18वीं सदी के अंत में बताया कि यूरोप से हुआ था। 19वीं सदी के पूर्वार्द्ध में यह पूर्वी यूरोप से लेकर अमेरिका तक तेजी से फैल गया था। औद्योगिकीकरण की प्रक्रिया में जीवाश्म ईंधन के लगातार प्रयोग से वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा में निरंतर वृद्धि होती गयी। इसका सीधा परिणाम पृथ्वी की गर्माहट के रूप में आज हमारे सामने है।

वैज्ञानिकों के अनुसार पृथ्वी के तापमान में पिछली शताब्दी की अपेक्षा इस शताब्दी में 1.5 डिग्री सेल्सियस तक की ही वृद्धि हुई। एक अन्य अनुमान के अनुसार वर्ष 2080 तक पृथ्वी के तापमान में 1 डिग्री से लेकर 3.5 डिग्री तक की वृद्धि की संभावना है।

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सामान्य रूप से पृथ्वी का तापमान लगभग स्थिर रहता है। यह स्थिति सूर्य से आने वाले ऊष्मीय विकिरण तथा पृथ्वी से परावर्तित होने वाली ऊष्मा के मध्य संतुलन से बनती है। सूर्य से पृथ्वी पर आने वाली उष्मा का 6 प्रतिशत अंश वायुमंडल में परावर्तित हो जाता है। इसी प्रकार इसका 27 प्रतिशत अंश बादलों द्वारा तथा 2 प्रतिशत अंश पृथ्वी की सतह द्वारा परावर्तित हो जाता है। इस प्रकार सौर ऊष्मा का 35 प्रतिशत अंश सीधे परावर्तित हो जाता है। शेष 65 प्रतिशत में से 14 प्रतिशत अंश वायुमण्डलीय गैसों द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है। शेष 51 प्रतिशत ऊष्मा पृथ्वी की सतह को प्राप्त होती है। यह ऊष्मा धीरे-धीरे अवरक्त विकिरण के रूप में वायुमण्डल से निकल जाती है।

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ओजोन क्षरण व उसके प्रभाव (Essay on global warming in Hindi)

ओजोन ऑक्सीजन का ही एक रूप है जिसमें दो के स्थान पर तीन अणु होते हैं। ओजोन परत के अभाव में अथवा इसके क्षीण होने की स्थिति में पराबैंगनी किरणें पृथ्वी की सतह तक पहुंचती है जो जीवधारियों से लेकर वनस्पतियों तक सभी के लिए हानिकारक होती है। सर्वप्रथम 1960 में ओजोन क्षरण की जानकारी प्राप्त हुई थी तथा 1984 में वैज्ञानिकों ने दक्षिणी ध्रुव के ऊपर 40 किमी. व्यास वाले ओजोन छिद्र का पता लगाया था। ओजोन परत वास्तव में ट्राइआक्सीजन की एक परत है जिसे ओजोन गैस भी कहा जाता है। यह रंगहीन होता है किन्तु द्रवित अवस्था में इसका रंग गहरा नीला होता है।

पृथ्वी की सतह के ऊपर क्षोभमंडल के आगे समतापमंडल होता है। ओजोन मंडल समताप मंडल के निचले भाग में 15 से 35 किमी. के मध्य स्थित होता है। उसकी ऊपरी सीमा 55 किमी. तक होती है। ओजोन का सर्वाधिक घनत्व 20-25 किमी. के मध्य रहता है। सूर्य से आनेवाली पराबैंगनी किरणें इस परत से या तो परावर्तित हो जाती हैं अथवा अवशोषित हो जाती हैं। इसके कारण ओजोन परत में तापमान की वृद्धि होती है। ओजोन परत के नीचे के भाग में तापमान समान रहता है। इसलिए इस मंडल को समताप मंडल कहते हैं।

ओजोन परत को सर्वाधिक क्षति पहुंचाने वाली गैस क्लोरीन होती है किन्तु यह मुक्त अवस्था में नहीं पाई जाती है। अतः यह अधिक क्षति नहीं कर पाती। इस प्रकार ओजोन परत को सर्वाधिक क्षति पहुंचाने वाली गैस क्लोरोफ्लोरो कार्बन मानी जाती है। इसके अतिरिक्त क्लोरीन, फ्लोरीन, ब्रोमीन, नाइट्स आक्साइड गैसें भी ओजोन परत को हानि पहुंचाती हैं।

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क्योटो प्रोटोकॉल

Essay on global warming in Hindi: विश्व व्यापी ताप वृद्धि का विश्व स्तर पर सामना करने हेतु 141 देशों के बीच हुआ क्योटो (जापान) समझौता 16 फरवरी, 2005 से लागू हो गया। ज्ञातव्य है कि क्योटो में विश्व जलवायु परिवर्तन पर 1 से 11 दिसम्बर, 1997 तक एक सम्मेलन आयोजित हुआ था। इस सम्मेलन के समापन पर जारी घोषणा पत्र अर्थात् “क्योटो प्रोटोकॉल” में छह गैसों (CO2, N2O, CH4, HFC, PFC, SF6) के उत्सर्जन में 1990 के स्तर पर 5.2% कटौती करने पर अमेरिका सहित 38.विकसित देशों द्वारा प्रतिबद्धता व्यक्त की गई। क्योटो प्रोटोकॉल’ की अनुसूची । (विकसित तथा औद्योगिक देशों हेतु) वाध्यकारी है, जबकि अनुसूची ॥ (विकासशील देशों हेतु) बाध्यकारी नहीं है।

इस संधि के अनुसार हस्ताक्षर करने वाले कुल 165 देशों में से 141 देश 2012 तक हरित गैसों के उत्सर्जन में 5.2 प्रतिशत की कटौती करेंगे। ऐसा न करने वाले देशों के लिए दण्ड का भी प्रावधान इस संधि में किया गया है। भारत क्योटो प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर के साथ-साथ इसकी पुष्टि भी कर चुका है। उल्लेखनीय है कि पुष्टि के बाद भी भारत पर किसी तरह की प्रतिबद्धता नहीं है और उसे ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन से किसी प्रकार की कटौती नहीं करनी है। क्योंकि वह विकसित देशों की सूची में नहीं है।

क्योटो प्रोटोकॉल की पुष्टि से भारत को कई फायदे हैं। इससे भारत में पुनर्नवीनीकरण ऊर्जा, ऊर्जा उत्पादन तथा वनीकरण योजना में निवेश होगा। इसके अलावा क्योटो प्रोटोकॉल से भारत को संतुलित विकास को मद्देनजर रखते हुए स्वच्छ प्रौद्योगिकी परियोजनाओं हेतु बाहरी सहायता भी प्राप्त हो सकेगा। इसी क्रम में जर्मनी के सहकारी बैंक के.एफ.डब्ल्यू. ने सर्वप्रथम कार्बन फंड की स्थापना की है और वह भारत के कार्बन क्रेडिट खरीदने को तैयार है।

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